Friday, April 10, 2026

यूँही नहीं तुम्हारा नाम लेते हैं आज भी

 यूँही नहीं तुम्हारा नाम… लेते हैं आज भी 

कुछ है जो ज़िंदगी तमाम मुझको ना दे सकी 

एक प्यास थी सो रह गई 

एक ज़ख़्म जो भरा नहीं 

उम्मीद थी के तुम कभी बैठोगे सामने 

देखोगे मुझको इस तरह के और कुछ ना हो 

पिघलेगा फिर धुवाँ-धुवाँ बनकर के दिल का बोझ 

आएगी एक नई सुबह अंधेरी रात की 

होगे कभी हमारे साथ पूरे के पूरे तुम 

साँसों में होंगी ख़ुशबूएँ भीगे बदन की और 

चेहरे पे झुककर आयेंगी ज़ुल्फ़ों की नरमियाँ 

सीने पे नर्म हाथों की ठण्डी सी गर्मियाँ 

बीहड़ में जैसे घूमता रहा मैं उम्र भर 

मैं पूछता रहा के पत्थर ही बोल दें 

कोई राज़ खोल दें 

कुछ भी किया जैसे जिया कुछ भी हुआ नहीं 

एक पल भी मुझको चैन का हरगिज़ मिला नहीं 

एक नाम था तुम्हारा जो मुझको था बेशतर 

इक छाँव थी तुम्हारी याद जिसमें मैं लौट कर 

आता रहा ये सोच कर के आओगे तुम कभी 

यूँही नहीं तुम्हारा नाम लेते हैं आज भी

यूँही नहीं तुम्हारा नाम लेते हैं आज भी

 यूँही नहीं तुम्हारा नाम… लेते हैं आज भी  कुछ है जो ज़िंदगी तमाम मुझको ना दे सकी  एक प्यास थी सो रह गई  एक ज़ख़्म जो भरा नहीं  उम्मीद थी के ...