Friday, July 16, 2010

स्याह आँचल रात्री का

बंद करके घर के दरवाज़े,
टूटे छप्पर से ऊपर देखूं तो
ऐसा लगता है के सारे तारे,
राज की बात कोई बताने को
जैसे चुपके से मेरे कानों में,
दैवीय गीत कोई गाने को
आये हों मेरे दुनिया में
रंग नया लाने को
फिर कहीं से चंदा बैरी
चला आये दबे पांव बीच हमारे
और रात्री के स्याह आँचल में
सिमट जाएँ सारे तारे.......
बात अधूरी रह जाती
हृदय की वेदना तड़पाती
समझ से मेरी बाहर है
तारों का मुझ तक आना
बिना कहे कुछ भी पर
अंधेरों में खो जाना ....

1 comment:

कडुवासच said...

...प्रभावशाली रचना !!!

यूँही नहीं तुम्हारा नाम लेते हैं आज भी

 यूँही नहीं तुम्हारा नाम… लेते हैं आज भी  कुछ है जो ज़िंदगी तमाम मुझको ना दे सकी  एक प्यास थी सो रह गई  एक ज़ख़्म जो भरा नहीं  उम्मीद थी के ...