Saturday, January 2, 2010

सिंगल ही है बढ़िया

इक ख्वाहिश थी जनम दिन की रात उसके hostel तक जाता
दांतों में दबा गुलाब pipe से ऊपर चढ़ जाता

उसको इस अंदाज में पहली बार मिल, हाले दिन कह आता
इक गुलाब और इक dairy milk से ज्यादा क्या मैं दे पाता

पर प्यार मेरा होता सच्चा, मेरी आँखों में नज़र उसे भी आता
यूँ शुरू होती अपनी कहानी, मैं भी lover boy कहलाता

पर हाय! मेरी किस्मत ऐसी, जिस कॉलेज से है मेरा नाता
इक भी लड़की का चेहरा दिल को मेरे न लुभा पाता

Katrina सी कोई होती, झट जोड़ लेता मैं नाता
Akshay से कोई कम थोड़ी हूँ, माना है बड़ा उसका (बैंक) खाता

पर ये तो हैं मेरे मन की बातें, नया दौर न मुझसे देखा जाता
SMS का है जमाना, अब कौन इस तरेह darling के हॉस्टल जाता?

मेसेज में happy लिख कर, copy paste करते हैं saved data
भाई यूँ तो सिंगल ही है बढ़िया, कम से कम फ़ोन बिल तो है कम आता

अभिव्यक्ति की क्षमताओं पर एक उपहास


सर्द सुबह की और भारी रजाई से दबा मैं
सोच में लेटा था की चाय की खोज किसने की?
नोबेल पुरस्कार उसे मिला या नहीं ?

बिस्तर पे लेटे दो चार शेर उसकी तारीफ में मार भी दिए
पर चाय भी कोई ठण्ड थोड़ी जो बिना मगाए द्वार तक आजाये
यथार्थ का बोध मन को था सो झिझक कर उठ गया
मुह धोने के लिए नल तक सकुचाता कांपते पहोच तो गया हूँ
पर काफी समय से एक उलझन में मूरत बन खड़ा हूँ

जो नल खोला तो कुरुक्षेत्र के मध्य अभिमन्यु सा मैं असहाय रह जाऊँगा
हॉस्टल का गीज़र किसी महान योद्धा के वस्त्र सा टंगा
किसी अजूबा घर में रखा मानो अपनी योग्यता बखान भर कर रहा है
उपयोगिता से उसका कोई आशय नही है
जाने कबसे यहाँ दीवार पे टंगा हम जैसे असहाय छात्रों पे इक व्यंग बना चिपका है ये

बहरहाल इस युद्ध से किसी तरह निकल
चाय की लालसा लिए ढाबे की तरफ कदम अब बढ़ चले हैं

बादलों या शायद धुंध की परत में छिपा सूरज
और समय का बदलना केवल घडी की धरातल पर
प्रहर का बोध करने गरज न रही सूरज में अब
और इस बीच ओस की बूंदों का
सूरज की रोक-टोक के बिना जमीन पर अटखेलियाँ खेलना

वो मजदूर किस तरह ढाबे की चाय में जीवन पा रहा है?
ये महिलाएं फूल तोडती ईश्वर आराधना में लीन मानो कुछ यथार्थ से अपरिचित
या कह लो अविचलित कैसे यूँ हंस देतीं हैं और सखी का हाल पूछ बैठती हैं ?
ऐसे मौसम में भला किसी मानव का क्या हाल हो सकता है ?
शायद छात्र शरीर ज्यादा सुकोमल हो सोच कर मुह फेर लेता हूँ

ढाबे पे वो छोटा बच्चा कैसे उन बर्तनों को धो रहा है?
इक फटा पुराना स्वेटर और एक टोपा
चाय की लालसा उसके चेहरे पर नही दिखती
न रहा गया जा हंस कर पूछ दिया मैंने -
"मुन्ना घर से इतनी जल्दी काम पर आगये ? ठण्ड नही लग रही क्या ?"
" घर नही है मेरा कोई, यहीं रहता हूँ ..काम नही करूंगा तो खाना नही मिलेगा सर "
कह कर वो फिर से अपने कर्म भूमि का अर्जुन बन गांडीव उठाये मानो चल पड़ा

स्तब्ध कुंठित स्वर में ईशवर से आत्मा ने मानो कुछ कहा, पर मैं सुन न सका
और बिना चाय पिए हॉस्टल वापस लौट आया

जीवन की लयबद्ध धारा में मानो इस सुबह ने विराम सा लगा दिया हो
एक तीव्र स्वर की गूँज ने झकझोर कर रख दिया है मानो
अपनत्व के बीच इक खोखलेपन का अनुभव कर रहा हूँ
उस जैसे बालक के लिए मैं दीवार पे टंगे
एक खराब गीज़र सा नही तो और क्या हूँ ?
भावनाओं की परिधि पर एक ही प्रशन फेरे लगा रहा है
और मेरी अभिव्यक्ति की क्षमताओं पर एक उपहास बने खड़ा है ?

Thursday, December 31, 2009

मधुशाला

इक अंतिम गीत मैं लिख लूं, फिर चलता हूँ मैं साकी
मैं तेरी है प्यारी मुझको, पर अब भी मुझमें है कुछ मैं बाकी

अपनी मैं मैं जरा पिला दूं, खाली सबके हैं प्याले
कुछ को पीने की ख्वाहिश है, पर होटों पे हैं ताले
ये कैसे हैं पीने वाले, जरा देख तो तू साकी
मद-डगमग न कोई पग है, हैं सबके होश बाकी

जरा मैं लिख लूं के अब भी दम है , माना के अब स्याही कम है
जोड़ रहा दो शब्द मैं ताकि
इक के भी रह ना जायें होश बाकी .......

आया था तू द्वार मेरे, बैठा जो तू दो पल साकी
कैसे करूँ अपमान मैं तेरा, चलता हूँ मैं तू चल साकी

छोड़ चलूँ मैं प्याला अपना, यहीं छोड़ता हूँ हाला
दूर देस है जाना हमको, दूर है तेरी मधुशाला
बंद करूँ क्यूँ अब कमरे को, है यहाँ कहाँ अब कुछ बाकी
मैं तेरी खींचे है मुझको, अब ले चल भी तू एय साकी .....

....................

Wednesday, December 30, 2009

आकाश की अवहेलना

दिसम्बर की सर्द दुपहरी में
धुप में कुरसी लगाये
आकाश चूमती इक पतंग पे टक-टकी बांधे बैठा हूँ

दूर से आते चिड़ियों की चेह्कन
गाड़ियों की आवाजें
कुछ दूर बैठी महिलाओं की बातें
और फिर से पतंग की सर सर

धुप का बायीं गाल को सहलाना
और आँखों का स्वयं ही बंद हो जाना
खो जाना कुछ खयालों में
पतंग सा लहराना

उस तडपती पतंग के पीछे किसी
अद्रिशय बालक और डोर का सवार्थ जुड़ा होगा
ये सोच कर हंस पड़ता हूँ
कागज़ पर पड़ी इस कविता के पीछे
इक भावुक मन का स्वार्थ जुड़ा होगा
ये सोच कर हंस पड़ता हूँ
अब पतंग के जीवन पर और क्या लिखों
उसका उड़ना निरर्थक सा लगता है ...
स्वार्थ और उससे जुड़े इन रंगों का आकाश चूमना
आकाश की अवहेलना नही तो और क्या है ?...

Sunday, December 27, 2009

क्यूँ इक भी कविता अब तक दिल को न लुभा पाई है ?

क्यूँ कवियों के इस जमघट पे इक खामोशइ सी छायी है
क्यूँ इक भी कविता अब तक दिल को न लुभा पाई है ?

कहाँ गयी वो लेखन शैली
कहाँ है वो रास विहार
कहाँ गए वो कवी महाजन
कहाँ गया वो श्रींगार


मेरी मानो चुप्पी तोड़ो
आओ बैठो शब्दों को जोड़ो
इक टूटी सी कविता बनाते हैं
मिल कर्र इक स्वर में उसे
फिर प्रेम से गाते हैं

तेरी कविता मेरी कविता
तुझसे अच्छी मेरी कविता

कविता तो बस आखर सरिता
किसकी कविता किसकी सरिता ?

आओ इस फुलवारी में
शब्ब्दों की इस क्यारी में
नए फूलों को उगते हैं
आओ मिल कर
गीत प्रेम का गाते हैं

Thursday, December 24, 2009

याद

याद है क्या तुम्हे वो उस दिन धुप में नंगे पांव मकबरे तक जाना
वो लोगों के फेंके सिक्कों को उठा हर्षाना

दौड़ना उस बूड़े बाबा का लाठी ले कर
वो खेतों खेतों भागते नए गावं पहुच जाना
वो गन्ने तोडना खेतों से
हाथों को फिर सहलाना
वो नेहर किनारे बैठ ज़ोरों से चिल्लाना

गिनना फिर उन सिक्कों का
सिक्कों में जीवन पाना
याद है क्या तुम्हे वो उस दिन धुप में मकबरे तक जाना ???

Saturday, December 19, 2009

हंसी के मुखोटे

चुभ जाना इक हार का दिल तक
आँखों से आंसूं आना
बंद करके दरवाजों को
कमरे में अकेले सो जाना

वो नींद में इक स्वप्ना का आना
झल्लाकर उठ जाना
खिड़की से बाहर झाँक
स्वप्न को जीवित पाना

वो आईने में शकल निहारना
बाल ठीक कर बाहर जाना
वो पूछ देना दोस्तों का
"क्यूँ खुश नही , क्यूँ घबराना ?"

वो हंस कर कहना -
"सो कर आया हूँ ...
सो लगता है रो कर आया हूँ ...
आँख नम है ...जुकाम है शायद
अभी अभी तो मुह धो कर्र आया हूँ "

मन में इक वेदना छिपाए
हृदय में n संन्कल्प दबाये
घूम रहा हूँ गली मोहल्ले
हंसी के मुकोते लगाये ....

मेरे सच्चे शेर

 बड़ा पायाब रिश्ता है मेरा मेरी ही हस्ती से ज़रा सी आँख लग जाये, मैं ख़ुद को भूल जाता हूँ (पायाब: shallow)  दरख़्तों को शिकायत है के तूफ़ाँ ...