आज दुखती रग पे खंजर रख रहा हूँ
फिर कसौटी पर सिकंदर रख रहा हूँ
पूछता था वक़्त वादों के वज़न
मैं तराजू पर समंदर रख रहा हूँ
कागजों की हैसियत इतनी नहीं
आसुओं के सैलाब अन्दर रख रहा हूँ
अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धूप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ
यूँही नहीं तुम्हारा नाम… लेते हैं आज भी कुछ है जो ज़िंदगी तमाम मुझको ना दे सकी एक प्यास थी सो रह गई एक ज़ख़्म जो भरा नहीं उम्मीद थी के ...
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