Tuesday, May 8, 2012

तुम्ही कह दो के मैं उनसे क्या कह दूं ?



कुछ शब्द बादलों से मिलते हैं
कुछ आसमाँ से
कुछ फूलों से, कलियों से, मौसम और बहारों से

कुछ शब्द नदियों से मिलते हैं
कुछ झीलों से
कुछ समंदर से, लहरों से, चट्टानों और साहिलों से

पर कुछ ऐसे भी शब्द है मेरे हमदम
जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लबों के तबस्सुम पर हैं
जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी बातों में, तुम्हारी आँखों में
तुम्हारे चेहरे पर और तुम्हारी जुल्फों से मिलते हैं

तुम सैकड़ों मैकदों का मद लिए अपने आँखों में
तुम सातों समन्दरों की उफान लिए अपनी आँखों में
तुम ग़ज़लों की किताब हो
तुम काव्य का स्वरुप हो

जो शब्द तुममे मिलते हैं
वो शब्द कहीं और नहीं मिलते
तुम पास होती हो, तो ग़ज़ल होती है
तुम दूर होती हो तो ग़ज़ल होती है

लोग मुझसे अक्सर पूछा करते हैं
के मैं शायर कैसे बना ?
तुम्ही कह दो के मैं उनसे क्या कह दूं ?

-ckh-

Friday, May 4, 2012

चश्म-ऐ-नम जब धुवाँ धुवाँ होगी


चश्म-ऐ-नम जब धुवाँ धुवाँ होगी
तब मेरी हर ग़ज़ल जवाँ होगी

लडखडाती है गर जुबाँ अबतक
बात आँखों से ही बयाँ होगी

फासले ही अगर ये मिट जाएँ
फिर वो दिल में खलिश कहाँ होगी

अर्श पर टूटते सितारों में
तेरी सूरत भी तो अयाँ होगी

आज 'चक्रेश' चुप यहाँ बैठे
सोचता है के वो कहाँ होगी

Wednesday, May 2, 2012

हम दुकान सजाते रहे और बाज़ार उठ गया,

हम दुकान सजाते रहे और बाज़ार उठ गया,
कुछ सामान दिखाते रहे और खरीदार उठ गया ;

हाथ पकड़ के हमने उसे बिठाया बार बार,
हाथ झटक के वो मेरा, बार बार उठ गया ;

कोतवालों ने किया घर नीलाम कुछ ऐसे ,
रूठ कर हिस्से से अपने, हकदार उठ गया ;

डूबकर उसकी ग़ज़ल में खोएं इस कदर ,
जागने से पहले ही वो फनकार उठ गया ;

Monday, April 30, 2012

बारहाँ एक ही मंज़र याद आये







बारहाँ एक ही मंज़र याद आये
इक सिसकता समंदर याद आये
आज दामन जो है खूंरेज ऐसे
उसके हाथों का खंजर याद आये

जब कभी टूटते हैं पैमाने
मुझको बिखरा हुआ घर याद आये

खुल रहा है नया सफ़्हा कोई
पिछले किस्से का सिकंदर याद आये

कल तलक वो जो था दिल का रिश्ता
वो नहीं दर्मियाँ पर याद आये

-चक्रेश-

Sunday, April 29, 2012

जिंदगी ही तो है


जिंदगी ही तो है
कोई शतरंज का खेल थोड़ी है
के हार-जीत में ही दिलचस्पी ली जाए
कौन खेल रहा है और किसके साथ
ये भी कहाँ मालूम है किसी को यहाँ यारों ?

जिंदगी ही तो है
कोई संजीदा सी ग़ज़ल थोड़ी है
के डूब कर सुनी जाए और सोचा जाए
के आखिर ऐसा क्यूँ होता है ?
नाग्मानिगार कौन, किरदार कौन और फनकार कौन
ये भी कहाँ मालूम है कैसी को यहाँ यारों ?

जिंदगी ही तो है
चलती रेल थोड़ी ही है
के जरूरी हो किसी सोचे हुए मकाम तक पहुंचना
और ये सोचना के अब आगे और कहाँ
जो चल रहा है वही मकाम होता हो शायद
कहाँ से आये कहाँ चले ?
ये भी कहाँ मालूम है किसी को यहाँ यारों

जिंदगी ही तो है
कोई पत्थर की लकीर थोड़ी ही है
के खिंच गयी तो हो जाए मिटाना मुश्किल
जो कह दिया, सो कर दिया, कभी रो दिए और कभी हंस दिए
क्या कहा, क्या किया, रोये क्यूँ और क्यूँ हँसे
ये भी कहाँ मालूम है किसी को यहाँ यारों

ज़िन्दगी ही तो है
और मैं इसे जीता हूँ
हर जागते पल में
एक फनकार की तरह
एक किरदार की तरह
बे बहार, बे वज़न, और बे तुकी सी जो है दिख रही
वो ग़ज़ल, वो सुखन, वो नग्मा मेरा है
और महक रही है मेरी रूह हर हर्फ़ में
कुछ असरार की तरह
क्या किया, क्यूँ किया, क्या न किया और क्यूँ नहीं
में जी मेरा लगता कहाँ

मैं जी चला ये जिंदगी
इक अंदाज़ में जो मेरा ही था
मीरा का, दाग या अहमद फ़राज़ का नहीं

-चक्रेश-



 

Sunday, April 22, 2012

तौबा ये असरार तुम्हारे


तौबा ये असरार तुम्हारे
पलकों के हथियार तुम्हारे

आँखों के रास्तों पे जा बैठे
दो दो हवलदार तुम्हारे

कासिद के हाथों ही भिजवा दो
शिकवा-फुगाँ-जार तुम्हारे

चंदा के मानिंद हो लेकिन
मुश्किल हैं दीदार तुम्हारे

-ckh-

मेरे सच्चे शेर

 बड़ा पायाब रिश्ता है मेरा मेरी ही हस्ती से ज़रा सी आँख लग जाये, मैं ख़ुद को भूल जाता हूँ (पायाब: shallow)  दरख़्तों को शिकायत है के तूफ़ाँ ...