Wednesday, April 7, 2010

एक तस्वीर

एक तस्वीर..
..अनभिज्ञ..
दर्शक की आँखों से
आज्ञाकारी, सुशील पुत्री सी
कलाकार पिता की तुलिका का मान रखती
एक संस्कृति को अपने आप के संजोये
मानो किसी आदेश का पालन करती
या किसी कपिल मुनि के शाप
से पत्थर बनी अहिल्या सी
राम के पद कमलों के स्पर्श की प्रतीक्षा में
सदियों से
चिपकी हुई है इन गुफाओं की पथरीली कठोर छाती पर

2 comments:

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Chakresh Singh said...

dhanyavaad sir :)

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...