कुछ पन्ने थें अधूरे दिल की किताब के
कुछ लिखा मिटा गए ये छीटे शराब के
सब-ऐ-फुरकत गुजारी मैकदे में कुछ ऐसे
चर्चे सारी रात चलें उन्ही के शबाब के
सिलवट नहीं चेहरे पर कोई शिकन न थी
रात दाग भी न था हुस्न पर माहताब के
फिर सय्याद दिन का तीर आँखों में चुभ गया
तनहाइयों से घिर गए सिलसिले टूटे खाब के
टुकड़ों से खाबों के कोई शिकवा नहीं लेकिन
चुभने लगे हैं ताने अब जहाँ-ने-खराब के
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