अंत अनंत का है नहीं फिर

अंत अनंत का है नहीं फिर
डगर का मोल क्या
मृतु मुक्ति है नहीं फिर
उमर* का मोल क्या ....................................................0

कारवां मेरा नहीं ये
मैं तो बस एक राहगीर
मैं किसी का हूँ नहीं फिर
सफ़र का मोल क्या .......................................................1

प्रभु के जिसको कहते हैं सब
पास होकर भी दूर है
धर्म मारने के हो काबिल फिर
ज़हर का मोल क्या.........................................................2


गर्भ सागर का गुहर से हो भरा
पल पल उठता तूफ़ान हो
खाली हाथ आये किनारे फिर
लहर का मोल क्या..........................................................3


टप टप टपकती चाँदनी का
'चक्रेश' एक चातक है तू
चाँद अनजान हो यदि फिर
चाक जिगर को मोल क्या...................................................4

चक्रेश चल अब लौट चल
चाह तुझको किसकी यहाँ पर
भीड़ में भी हो तू अकेला फिर
शहर का मोल क्या...........................................................5

Comments

बहुत खूब, लाजबाब !
Dev said…
बहुत खूब
भीड़ में भी तू अकेला फिर शहर का मोल क्या ?
Mahaguru said…
awesome ..chakresh bhai aap shreshthtam ki or agrasar hain ..really a masterpiece..

Popular posts from this blog

Sochata hun ke wo (Nusrat Fateh Ali Khan) Translation

The Indian Civilization (A Sequel)

KATHPUTALI(Hindi poem)