Saturday, April 17, 2010

अंत अनंत का है नहीं फिर

अंत अनंत का है नहीं फिर
डगर का मोल क्या
मृतु मुक्ति है नहीं फिर
उमर* का मोल क्या ....................................................0

कारवां मेरा नहीं ये
मैं तो बस एक राहगीर
मैं किसी का हूँ नहीं फिर
सफ़र का मोल क्या .......................................................1

प्रभु के जिसको कहते हैं सब
पास होकर भी दूर है
धर्म मारने के हो काबिल फिर
ज़हर का मोल क्या.........................................................2


गर्भ सागर का गुहर से हो भरा
पल पल उठता तूफ़ान हो
खाली हाथ आये किनारे फिर
लहर का मोल क्या..........................................................3


टप टप टपकती चाँदनी का
'चक्रेश' एक चातक है तू
चाँद अनजान हो यदि फिर
चाक जिगर को मोल क्या...................................................4

चक्रेश चल अब लौट चल
चाह तुझको किसकी यहाँ पर
भीड़ में भी हो तू अकेला फिर
शहर का मोल क्या...........................................................5

3 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत खूब, लाजबाब !

Dev said...

बहुत खूब
भीड़ में भी तू अकेला फिर शहर का मोल क्या ?

Mahaguru said...

awesome ..chakresh bhai aap shreshthtam ki or agrasar hain ..really a masterpiece..

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...