Monday, August 13, 2012

ये खलिश और ये जवानी भी

ये खलिश और ये जवानी भी 
ख़त्म होगी मेरी कहानी भी 

आप की चाहतों की बारिश में 
खिल उठी इक ग़ज़ल पुरानी भी 

अपनी मजबूरियाँ ये तकलीफें 
कुछ कही कुछ पड़ी छुपानी भी 

खैर अफ़सोस तो रहेगा ही
खो गयी प्यार की निशानी भी

जो न मिलते कभी भी उनसे तो
यूँ न होता गुहर ये पानी भी

3 comments:

रविकर फैजाबादी said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के चर्चा मंच पर ।।

सुशील said...

चाह्तों की बारिश में
यूँ ही भीगते रहे आप
इसी तरह एक सुंदर
गजल साथ साथ ही
लिखते भी रहें आप !!

Rajesh Kumari said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति शुभकामनायें

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...