मेरे हाल पे मुझे छोड़ दो
ये दोस्ती भी अब तोड़ दो
न ग़ज़ल बने न खलिश पले
इन उँगलियों को मरोड़ दो
मैं जगह-जगह से टूटा हूँ
गर हो सके मुझे जोड़ दो
अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धूप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ
Tuesday, March 20, 2012
Friday, March 16, 2012
मैं क्या बतलाऊँ कौन हो तुम
तुम रागों में
तुम शब्दों में
तुम ज्योति में
तुम जीवन में
तुम भावों में
तुम सरिता में
तुम धड़कन में
तुम कविता में
तुम नाम नहीं
तुम काम नहीं
तुम पूजा हो
तुम कण कण में
तुम फूलों में
तुम कलियों में
तुम मंदिर में
तुम मूरत में
तुम सीपी में
तुम मोती में
तुम सागर में
तुम लहरों में
मैं कौन भला ?
मैं क्या जानूं ?
हो काव्य में तुम
तुम दर्शन में
तुम चंदा में
तुम तारों में
तुम ज्वाला में
अंगारों में
बचपन में तुम
तुम योवन में
ऋतुओं में तुम
तुम सावन में
तुलसी में तुम
रबिदास में तुम
तुम श्लोकों में
हर सांस में तुम
मैं क्या बतलाऊँ कौन हो तुम
-ckh-
kaise bataaooN main tumhe ....mere liye tum kaun ho .....
तुम शब्दों में
तुम ज्योति में
तुम जीवन में
तुम भावों में
तुम सरिता में
तुम धड़कन में
तुम कविता में
तुम नाम नहीं
तुम काम नहीं
तुम पूजा हो
तुम कण कण में
तुम फूलों में
तुम कलियों में
तुम मंदिर में
तुम मूरत में
तुम सीपी में
तुम मोती में
तुम सागर में
तुम लहरों में
मैं कौन भला ?
मैं क्या जानूं ?
हो काव्य में तुम
तुम दर्शन में
तुम चंदा में
तुम तारों में
तुम ज्वाला में
अंगारों में
बचपन में तुम
तुम योवन में
ऋतुओं में तुम
तुम सावन में
तुलसी में तुम
रबिदास में तुम
तुम श्लोकों में
हर सांस में तुम
मैं क्या बतलाऊँ कौन हो तुम
-ckh-
kaise bataaooN main tumhe ....mere liye tum kaun ho .....
Tuesday, March 13, 2012
यार तुम मिलो तो सही
कुछ कहूं
कुछ सुनूं
कह सकूं
सुन सकूं
दोस्त थे तुम मेरे
मैं कभी बन सकूं
हो ये सब कुछ मगर
हाथ में हाथ हो
कोई शाम साथ हो
यार तुम मिलो तो सही !!!
क्या कहा
क्या किया
रात दिन
सुबह शाम
चाँद से
ख्वाब में
कौन सी बात की ?
कब उठा
कब नहीं
जीता क्या
हारा कर
यार ये सब हुआ
और मैं ढूँढता हूँ कहीं हो जो तुम
हो गुजर रही यूँही
जिंदगी तुम्हारी भी
पर मगर
क्या करूँ सामने जो तुम नहीं
क्या कहूं
क्या करूँ
जीत में हार में
सांस की हर पुकार में
हो मगर दूर हो
यार तुम मिलो तो सही
कुछ सुनूं
कह सकूं
सुन सकूं
दोस्त थे तुम मेरे
मैं कभी बन सकूं
हो ये सब कुछ मगर
हाथ में हाथ हो
कोई शाम साथ हो
यार तुम मिलो तो सही !!!
क्या कहा
क्या किया
रात दिन
सुबह शाम
चाँद से
ख्वाब में
कौन सी बात की ?
कब उठा
कब नहीं
जीता क्या
हारा कर
यार ये सब हुआ
और मैं ढूँढता हूँ कहीं हो जो तुम
हो गुजर रही यूँही
जिंदगी तुम्हारी भी
पर मगर
क्या करूँ सामने जो तुम नहीं
क्या कहूं
क्या करूँ
जीत में हार में
सांस की हर पुकार में
हो मगर दूर हो
यार तुम मिलो तो सही
Thursday, March 8, 2012
हमसे आबाद थी तेरी महफ़िल
हमसे आबाद थी तेरी महफ़िल, खैर तू ये समझता नहीं है
हर घड़ी आज़माता अदम को, खुद कभी भी उलझता नहीं है
हमने सदिओं से चाहा तुझी को, पर ये वेह्शत बढ़ी जा रही है
तू अगर देखता है ये आलम, बोल फिर क्यूँ बरसता नहीं है ?
सुर्ख होटों पे भी आज गम हैं, नर्म आँखों के कोने भी नम हैं
ऐ खुदा! हाथ उठाये ये बन्दे, बोल क्यूँ तू गरजता नहीं है ?
फिर से जर जर हुयी हैं दीवारें, मेरे गाँव में कोई नहीं है
हँसते बच्चों की आवाज़ को क्या, ऐ खुदा तू तरसता नहीं है ?
फिर से वीराना सा छा रहा है, और शम्माएं भी बुझ रही हैं
हर शहर आज ईटों का है ढेरा , कोई पंछी क्यूँ दिखता नहीं है ?
(Written in reference to the blood bath going on in Syria)
हर घड़ी आज़माता अदम को, खुद कभी भी उलझता नहीं है
हमने सदिओं से चाहा तुझी को, पर ये वेह्शत बढ़ी जा रही है
तू अगर देखता है ये आलम, बोल फिर क्यूँ बरसता नहीं है ?
सुर्ख होटों पे भी आज गम हैं, नर्म आँखों के कोने भी नम हैं
ऐ खुदा! हाथ उठाये ये बन्दे, बोल क्यूँ तू गरजता नहीं है ?
फिर से जर जर हुयी हैं दीवारें, मेरे गाँव में कोई नहीं है
हँसते बच्चों की आवाज़ को क्या, ऐ खुदा तू तरसता नहीं है ?
फिर से वीराना सा छा रहा है, और शम्माएं भी बुझ रही हैं
हर शहर आज ईटों का है ढेरा , कोई पंछी क्यूँ दिखता नहीं है ?
(Written in reference to the blood bath going on in Syria)
Sunday, March 4, 2012
ऐ ज़िन्दगी तू बिकुल ऐसी ही रह सकेगी क्या
ऐ ज़िन्दगी तू बिकुल ऐसी ही रह सकेगी क्या
सारे दोस्त यार बगल के कमरें में बैठे
हस्ते रहें
उनकी आवाजें मुझतक आती रहे
मैं यहाँ खामोश
अकेला
इस कमरे में
यूँही बैठा रहूँ
गर्म पलकों की सुस्त झपकी पर
कुछ सोछों
सोच कर मुस्काऊँ
ऐ ज़िन्दगी तू बिलकुल ऐसी ही रह सकेगी क्या ?
यूँही रह रह कर
कोई आता रहे जाता रहे
मेरे कमरे में
और मैं यहाँ यूँही लिखता रहूँ
सुनाता रहूँ उलझी हुई आवाजें
Thursday, March 1, 2012
I jumped
I stood at cliff of a mountain amidst few dry and thorny shrubs. There was a river underneath, flowing in the valley. I looked up and filled my hearth with the vast stretch of the endless skies. With staggering legs, I bent a little to take off my shoes. Tired of thinking and trying to figure out the answers to eternal questions, I smiles and leaped forward a little to hear the sound of the rustling river even more clearly. When the soul felt free of desires and relent, I decided in a split second and jumped into the valley from the cliff, leaving behind my shoes and cloth. A moment of despair and then total loss of control of anything and everything around me. Few moments in the air, and then came the fnal realization - its in loosing it all that one finally finds something worth a life time of pain and anguish. As I got submersed in the river, the body floated a mile or two, before they say, a fisheman found me still alive. Now I am here, all nacked and wet. It must be a new world a new life I believe. There must be a better eve a better day to come.
हमने ठुकराई है पा कर दुनिया
हमने ठुकराई है पा कर दुनिया, आप कहते हैं हम दीवाने हैं
खैर फिर भी गिला नहीं हमको, ये तो लोगों के ढब पुराने हैं
किस गली जा रहे हैं कैसे कहें, क्यूँ यहाँ एक पल गंवारा नहीं
कौन समझा है जो के समझायें, कितने वादे हमें निभाने हैं
बीतते वक़्त से न रखें रिश्ता, कल की सुबह को दुल्हन कह दें
चाँदनी खुद से ही शर्मा जाए, हम तो उस दर्जे के परवाने हैं
आज भी कमरों चंद खिड़कियाँ, कुण्डी तलास कराती हैं
अब निकलते हैं तेरी महफ़िल से, हमें कुछ दरवाज़े खट-खटाने हैं
यूँ तो उनका नहीं है कोई निशाँ, और हमको नहीं है उनकी ख़बर
फिर भी 'चक्रेश' रोज़ कहता है, तुमको कुछ रिश्ते नए बनाने हैं
खैर फिर भी गिला नहीं हमको, ये तो लोगों के ढब पुराने हैं
किस गली जा रहे हैं कैसे कहें, क्यूँ यहाँ एक पल गंवारा नहीं
कौन समझा है जो के समझायें, कितने वादे हमें निभाने हैं
बीतते वक़्त से न रखें रिश्ता, कल की सुबह को दुल्हन कह दें
चाँदनी खुद से ही शर्मा जाए, हम तो उस दर्जे के परवाने हैं
आज भी कमरों चंद खिड़कियाँ, कुण्डी तलास कराती हैं
अब निकलते हैं तेरी महफ़िल से, हमें कुछ दरवाज़े खट-खटाने हैं
यूँ तो उनका नहीं है कोई निशाँ, और हमको नहीं है उनकी ख़बर
फिर भी 'चक्रेश' रोज़ कहता है, तुमको कुछ रिश्ते नए बनाने हैं
मेरे सच्चे शेर
बड़ा पायाब रिश्ता है मेरा मेरी ही हस्ती से ज़रा सी आँख लग जाये, मैं ख़ुद को भूल जाता हूँ (पायाब: shallow) दरख़्तों को शिकायत है के तूफ़ाँ ...
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(Note: Though I am not good at Urdu, its not my mother tounge, but I have made an attempt to translate it. I hope this will convey the gist...
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(Ram V. Sir's explanation) vAsudhEvEndhra yogIndhram nathvA gnApradham gurum | mumukshUNAm hithArThAya thathvaboDhaH aBiDhIyathE || ...
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उन पे रोना, आँहें भरना, अपनी फ़ितरत ही नहीं… याद करके, टूट जाने, सी तबीयत ही नहीं रोग सा, भर के नसों में, फिल्मी गानों का नशा ख़ुद के हा...