Tuesday, February 2, 2010

समय कभी नही बढ़ता


पेंसिल के छिलके
जमीन पर पड़े हुए
और बगल में सफ़ेद पीसी हुई chalk*
सर झुककर देख रहा था ..."चुप चाप"

याद आ रहा था बचपन
वो स्कूल का एक दिन

वो नन्हे हाथ
वो पेंसिल
वो पेंसिल की नोक
नोक का टूट जाना
वो नयी नोक बनाना
वो चिलाकर रोना
वो खिल खिला कर हँसना

इस बीच एक तीव्र स्वर
एक फटकार
एक चीख
झक झोर रही थी मुझे
भूत से निकल कर
वर्त्तमान
में लाने को तत्पर

पर उस पीसी chalk
उस पेंसिल के छिलके से
आँख हट नही रही थी ..."उस दिन"

जमीन की सतह पर कुछ नही बदलता

समय कभी नही बढ़ता
जमीन समय से है अनजान
वर्त्तमान ही भूत था
भूत ही था वर्त्तमान


...........................

कहीं अकेले में



अखबार का पहला पृष्ठ
कुछ खबरें
कुछ तसवीरें
कुछ सच
कुछ झूट
पढता चाव से इन्हें समय बीतने के लिए
एक हिन्दू
एक मुसलमान,
और इस बीच ...कहीं अकेले में
रोता बिलखता एक छात्र
तड़पता एक पिता
आत्म-हत्या करता एक किसान

मुसाफिर


जीवन तट पर खड़ा मुसाफिर
देख रहा है जीवन धार
नितांत अकेला इस पार मुसाफिर
सोच रहा-क्या है उस पार

इक उम्र चल चूका मुसाफिर
अचल खड़ा है आज इस पार
देख नग्न- सत्य की तलवार मुसाफिर
सोच रहा- क्या है उस पार

अनुतरित प्रशनों से घिरा मुसाफिर
देख रहा है मृग तृष्णाओं का संसार
असमंजस मध्य इस पार मुसाफिर
सोच रहा -क्या है उस पार

कवी बन बैठा आज मुसाफिर
हृदय लिए भावनाओं का उबार
सर्वस्व हार चूका मुसाफिर
सोच रहा-ये कैसी हार

Sunday, January 31, 2010

मौन



छुक छुक करती रेल
और पूरे चाँद की चांदनी तले चमकते
दूर तक विस्तृत सुनसान खेत
खिड़की पे चुप बैठा मैं सुन रहा हूँ
इक मौन

सर सर करती पवन
और उसके साथ झूमते मेरे बाल
थका हारा मैं
सोने की अभिलाषा लिए
सो नही पा रहा, है चरों ओर
इक भयावह मौन का शोर

और फिर वही दूर तक विस्तृत खेत
खेतों के सीने पे खिंची अनगिनत पग्दंदियाँ
हाँथ की रेखाओं जैसे
खेत के भाग्य को निर्धारित करतीं
दूर तक विस्तृत निद्रा, जीवन रहित रात
और बस मैं और चाँद की (उधार की) चाँदनी

जाने क्यूँ मुझे अब तक जगा रखा है
इस मौन ने
जीवन तू हमसफ़र है, इक राह चल चुके हैं साथ हम
कहीं आगे कोई मोड़ होगा जहाँ तुझसे अलग हो जाऊँगा मैं

और इस बीच पटरियां बदली रेल

क्या लिख रहा हूँ
हिलती इस कलम से चलती रेल में
कागज के सीने पे
पग्दंदियाँ खीचता चला जा रहा हूँ
क्यूँ नही वो मौन इन कागजों में उतर पता है
क्यूँ वह माटी का पुतला दूर खेत में चिड़ियों को बैठने से रोकता है
क्यूँ ये रेल रुकती नही कहीं

Wednesday, January 27, 2010

कुछ भूल सकता नही

कुछ बातें भूल सकता हूँ ...कुछ भूल सकता नही
कुछ याद रहता नही मुझे, कभी कुछ भूल सकता नही ...................................0



पल भर का इक मोड़ पर रुक जाना, वो ठहराव क्या था ?
अनजान पथिक संग बहते चले जाना, वो बहाव क्या था ?
आज पूछ रहा हूँ अकेला दीवारों से मैं
दे गया बिछड़ कर जो वो मुझे, आखिर वो घाव क्या था ?
कुछ घाव सह सकता हूँ, कुछ सह सकता नही
कुछ बातें भूल सकता हूँ , कुछ भूल सकता नही ..................................................1

हार कर तकलीफ में मुझे, वो पुकारना क्या था ?
हाथ मेरा थाम तूफ़ान में, वो समहलाना क्या था ?
पूछ रहा हूँ आज हंस कर खुद से मैं
फिर इक दिन मुझे अनजान कह, वो मुह फेर लेना क्या था ?
कुछ बेरुखी माफ़ कर सकता हूँ , कुछ भी माफ़ कर सकता नही
कुछ बातें भूल सकता हूँ , कुछ भूल सकता नही ......................................................2


मुझसे सारी बातें बताना , वो अटूट विशवास क्या था ?
मुझमें सब कुछ उचित पाना, वो मुझमें ख़ास क्या था ?
पूछ रहा हूँ सब जान कर भी मैं
बाज़ार में मुझे नीलाम करने का, वो प्रयास क्या था ?
लुटा सकता हूँ सब कुछ, कुछ लुटा सकता नही
कुछ बातें भूल सकता हूँ कुछ भूल सकता नही....................................................3

Wednesday, January 20, 2010

शर्मा जी शर्म करो

शर्मा जी शर्म करो
थोड़ा तो धैर्य धरो

आज ही तो
बेटा बना है कलेक्टर
आज ही थोड़ी
लूट लो गे सबका घर

ऊपर वाले से जरा डरो
शर्मा जी शर्म करो

अरे काफी कमाएगा
है सरकारी नौकरी
सुना कवारी है
मिनिस्टर की छोकरी

दहेज़ demand तोडा नरम करो
शर्मा जी शर्म करो


सुना है पोस्टिंग
बीकानेर में है
वहां का भी कानून
अंधेर में है

कुछ तो अच्छे करम करो
शर्मा जी शर्म करो

Tuesday, January 19, 2010

गीता सार क्या है?

घड़ी की गणना क्या है
समय का बड़ना क्या है
क्या है वर्त्तमान का भूत हो जाना
रवि का उतरना चड़ना क्या है ........१



इन प्रशनो* में तेरा विचरण क्या है
'चक्रेस' ये पागलपन क्या है
क्या है सुबोध संज्ञान का होना
ये मुड़ता अज्ञान क्या है .................२

शून्य में अकेला होना क्या है
कुछ पाकर खो देना क्या है
क्या है अनवरत चलते जाना पथ पर
चलकर कुछ दूर रुक जाना क्या है ..................३

परम सत्य विज्ञान क्या है
चक्रेस गीता कुरान क्या है
क्या है भीड़ में खो जाना
जीवन का संविधान क्या है .................४

कर्म फलों का भार क्या है
नश्वर है तो ये संसार क्या है
क्या है कुरुक्षेत्र मध्य आज 'चक्रेस' का रोना
केशव आज गीता सार क्या है ..................५

मेरे सच्चे शेर

 बड़ा पायाब रिश्ता है मेरा मेरी ही हस्ती से ज़रा सी आँख लग जाये, मैं ख़ुद को भूल जाता हूँ (पायाब: shallow)  दरख़्तों को शिकायत है के तूफ़ाँ ...