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Showing posts from May, 2011

वो मैं था

वो मैं था
वो मैं था
जो कहता था उस दिन
के सब कुछ यहाँ का
यहीं पर रहेगा
जो सुनते हो तुम ये
आज मेरी जुबानी
ये कविता कोई और
कल फिर कहेगा

Without any title

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The hardest part in writing this blog post was to decide the topic of it. Having realized that it does not matters, I decided to keep it without any title. There has been a lot of upheaval in my head for about past fifteen years. I could sense one thing very early in my life, and that was: I am all that matters to me. I could see a grand meaninglessness in everything and anything around me. Now, when I have completed my graduation and I am having job, some new dimensions of understanding have come up from within.
Being a good observer of nature and surrounding, I could observe few things more closely and by the grace of God (who in my case is not a Hindu or a Muslim), I could write down some poems which I cherish as my children. There had been questions though, which were disturbing. The questions were mainly about what I was doing and why. Logic is what we run after all the time. The chase can be painful but the fulfillment of it is equally pleasant and rewarding. I ended up with …

होता है जो अच्छे के लिए होता होगा

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होता है जो अच्छे के लिए होता होगा

तो क्या हुआ जो कोई कहीं रोता होगा



दिन के उजालों में हों टूटते जिसके सपने

ख्व़ाब चाँदनी-तले वो सारे संजोता होगा



वो जो बच्चों से दिल का मालिक है

कस्तियाँ कागजों की अब भी डुबोता होगा



भूल जाना कहाँ सीख पाया 'चक्रेश'

पुराने खारों से रूह अब भी चुभोता होगा

मोमिन न मैं फ़िराक न ग़ालिब न मीर हूँ

मोमिन न मैं फ़िराक न ग़ालिब न मीर हूँ
इक आग का गोला हूँ मैं अर्जुन का तीर हूँ

जुज़ नाम बिना काम मैं फिरता हूँ शहर में
बस्ती में बड़ा नाम है दिल का अमीर हूँ

इक लफ्ज़ नहीं बोलता वाइज़ की बात पर
गीता हूँ मैं कुरान हूँ इक जलता शरीर हूँ

तेरा नाम लिख कर मिटाते मिटाते

तेरा नाम लिख कर मिटाते मिटाते
तेरे हर इक ख़त को जलाते जलाते
यूँ लगता है खुद को भुला हम हैं बैठे
तुझे जेहन-ओ-दिल से भुलाते भुलाते

कभी कभी मेरे दिल में ये ख़याल आता है

कभी कभी मेरे दिल में ये ख़याल आता है
के इस एक उम्र के तमाम लम्हे ख़ुशी के हो भी सकते थें
पर ये हो न सका
जिंदगी हर एक राह हर एक मंजिल एक नया सफहा खोलती गयी अलिफ़ लैला की दास्तानों सी
और हर एक हर्फ़ एक नए सफ़र के इशारे लेकर
आता रहा ..... जाता रहा
कभी कभी मेरे दिल में ये ख़याल आता है