निष्कंटक पथ, पुष्प वाटिका ,
ना है ना थी चाह कभी ,
योग का जीवन, तपता तन मन ,
कभी भी रुकती राह नही
अश्रू संचित करते दो नयन ,
नित दिन ताका करते हैं ,
ओस में घुली शीतल किरणों से,
नित दिन माँगा करते,
एक नया दिन उज्वल हिम सा,
जिसमे हो निशा की श्याह नहीं
अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धूप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ
Wednesday, December 28, 2011
Tuesday, November 29, 2011
Sketch - 001
Sunday, November 27, 2011
चुभती हैं मुझे शहर-ऐ-समझदार की बातें
चुभती हैं मुझे शहर-ऐ-समझदार की बातें
दिल ऊब चुका सुन कर बेकार की बातें
कहते हैं के काफी थी मेरे हिस्से की हँसी
अब वक़्त है के समझूं is संसार बातें
मुझसे जुदा खड़े हैं मुझे सब जानने वाले
इनको न रास आयीं मेरी प्यार की बातें
मेरे ख्वाब में परी थी, बाहों में फैले बादल
कितनी अजीब हैं पर, ये कारोबार की बातें
टुकड़ों में जी रहा हूँ, क्यूँ ज़िन्दगी तुझे
कब हो गयीं ज़रूरी, कुछ दो-चार की बातें
Friday, November 25, 2011
नाम ३
तखल्लुस ढूँढने निकला था
फिर शाम, साहिल की गीली रेतों पर
और फिर वही बेनामी लेकर
लौट आया घर को मैं...
नाम २
सोच रहा था के होने वाले बेटे का नाम 'जुनैद सिंह' रखूंगा...
फिर याद आया के मैं तो हिन्दू हूँ ...
फिर याद आया के मैं तो हिन्दू हूँ ...
नाम १
जाने क्या शिकायत है लहरों को
जाने क्या बेचैनी है
नाम है मेरा मैं थोड़ी हूँ
फिर भी इतनी नाराजी!!!
सौ बार लिखा गीली रेतों पर
सौ बार मिटा कर चली गयीं
शायद इनको साहिलों पर
शोर शराबा पसंद नहीं
मुझको ये सागर कुछ ऐसा,
अनजान दिखाई पड़ता है
जैसे के हो कर भी न हो
होने न होने में
कुछ होने न होने का चक्कर..
मैं न जानूं क्या है पर
अदाज जुदा सा है इसका
सोचता हूँ शायर ही कह दूं
कुछ नाम तो देना होगा आखिर
वर्ना होना न होना सा होगा
कम से कम मेरी दुनिया में..
इसकी शिद्दत में ये लहरें
अपने होने को भूल चुकीं
और बेतुकी बातों से आगे
चलकर जीती जाती हैं
क्यूँ न फिर नाम ये मेरा
बेमतलब बेजान लगे
क्यूँ न मेरे होने को ये
दरकिनार कर के बढ़ आयें ...
और इस सब के होते होते
दूर थका सूरज ठंडा पढ़ सा जाता है
शाम गुलाबी साड़ी में लिपटी
मफलूस आईने के आगे बैठी
नयी दुल्हन सी दिखती है
बादल, हवा, रंगों को लेकर
सजती पल भर के मिलने को मुझसे
पति समंदर की खामोशी पर शर्मिंदा
कुछ मेहमान नवाजी करने को
कुछ परिंदे शाख ढूँढते
फिरते देखा करता हूँ
हर शाम अंधेरों से निकल कर
मैं दिन को देखा करता हूँ
अपने होने न होने पर
लहरों से बातें करता हूँ
और शाम को अपने आगे बिठाकर
लिखता हूँ
सुनाता हूँ
हँसता हूँ
हंसाता हूँ
बस ऐसे ही जीता आया हूँ
बस ऐसे ही जीता जाता हूँ
Tuesday, November 22, 2011
साहिल मेरी जुबाँ
साहिल मेरी जुबाँ, दरिया है मेरा दिल
दाइम सुबहो-से-शाम, बहता है मेरा दिल
हर्फ़-ऐ-गुहर अक्सर आते हैं लबों तक
यादों की सीपियाँ, रखता है मेरा दिल
मुझसे न पूछिए, सफीनों का डूबना
नाखुदा न जान पाए के क्या है मेरा दिल
मेरे सच्चे शेर
बड़ा पायाब रिश्ता है मेरा मेरी ही हस्ती से ज़रा सी आँख लग जाये, मैं ख़ुद को भूल जाता हूँ (पायाब: shallow) दरख़्तों को शिकायत है के तूफ़ाँ ...
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(Note: Though I am not good at Urdu, its not my mother tounge, but I have made an attempt to translate it. I hope this will convey the gist...
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(Ram V. Sir's explanation) vAsudhEvEndhra yogIndhram nathvA gnApradham gurum | mumukshUNAm hithArThAya thathvaboDhaH aBiDhIyathE || ...
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कभी समय के साथ जो चलकर भूल गया मैं मुस्काना मेरी कविताओं फिर तुम भी धू-धू कर के जल जाना बहुत देर से चलता आया बिन सिसकी बिन आहों के आज अगर ...

