तखल्लुस ढूँढने निकला था
फिर शाम, साहिल की गीली रेतों पर
और फिर वही बेनामी लेकर
लौट आया घर को मैं...
अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धूप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ
यूँही नहीं तुम्हारा नाम… लेते हैं आज भी कुछ है जो ज़िंदगी तमाम मुझको ना दे सकी एक प्यास थी सो रह गई एक ज़ख़्म जो भरा नहीं उम्मीद थी के ...
1 comment:
बहुत खूब ||
आभार ||
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