गरीबी: एक आउट ऑफ़ फैशन सवाल

"कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए
अब चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए" - दुष्यंत 

जीवन संगीत के आरोह और अवरोह सुनता, साँसों की लय ताल पर आह वाह करता और पलकें झपकाता आँखें फाड़ता कभी कभी ये भी सोचता हूँ कि सृष्टि के इस विचित्र सगीतमय समाहरोह में मैं मात्र एक श्रोता हूँ या संगीतकार पिता का चहेता शिष्य जिसके कंठ से फूटते स्वरों को सुनने के लिए वह विधाता कान लगा कर, व्याकुलता के साथ, उत्सुकता के साथ धरती कि ओर  ध्यान लगाए हुए है।


इस सब के बीच भारत की तस्वीर अपने सम्मुख रख के जब जब कुछ कहने का प्रयास किया है कंठ सूख ही गया है मेरा। ऐसा नहीं है कि सब ओर केवल विलाप और दुर्बलता ही देखता हूँ कहीं कहीं पर हर्ष, उल्लास और भोग-विलास भी है| मुझे जो मौन दे जाती है वो भारत की वह तस्वीर है जिसपर केवल मैं ही नहीं बल्कि सारा भारत मौन धरे बैठा है। कल तक जिन दुःखी जनों को हाथ दे कर उठाने का संकल्प कुछ बुद्धिजीवियों की  प्रेरणा का श्रोत था वो आज एक ऐसा भारी बस्ता सा बन गया है कि हर कोई उसे उतार फेंक पश्चिम की ओर तेजी से निकलना चाहता है।

गरीब 'आउट ऑफ़ फैशन'  हो चूका है अब उसकी बात न सिनेमा जगत करना चाहता है न सही अर्थों में नेता या लेखक। आप मेरी इस बात से सहमत नहीं होंगे क्यूंकि जहाँ देखिये वहाँ गरीबी हटाने को लेकर नेता बात करते सुनाई पड़ते हैं। फिर मैं ऐसा क्यूँ कह रहा हूँ? दरअसल मैं ह्रदय के स्वरों की बात कर रहा हूँ। कथनी और करनी के बीच की खाईं की ओर इशारा था मेरा|

सोवियत यूनियन के विघटन के बाद आयी अमरीकी उपनिवेश और कोट-पैंट वाले पूंजीपतियों की लहर का प्रवाह इतना तेज़ है कि आज जिन सिद्धांतों पर भारत का निर्माण हुआ वो बौने दिखाई देते हैं। 'सामाजिक लोकतंत्र' हर बड़ी भीड़ से अलग-थलग, अकेला अपने अस्तिव को लेकर प्रश्न चिन्ह बना सा दीखता है। गरीबों की बात भी होती है, वोट बैंक पॉलिटिक्स भी लेकिन गरीबी है जो के केवल कागज़ पर कम होती नज़र आती है। 'इन्वेस्टर सेंटिमेंट' का ऐसा दबाव हमारे देश के शीर्ष नेतृत्व पर इतिहास में पहले कभी देखने को नहीं मिलता जितना के आज हम देखते हैं।




















औरों की क्या बात करूं, मेरे कमरे की आलमारी में धूल चाटती प्रेमचंद की किताबें ही मुझे सवालिया नज़र के साथ देखती हैं। मैं कौन सा गरीबों की व्यथा और दुःख दर्शाते लेखों पर घंटे बिताने को तैयार हूँ? मैं कौन सा प्रधानमंत्री बनने जा रहा हूँ और बन भी गया तो मैं कौन सा बरसों के बने राजनैतिक तानाशाही और कॉर्पोरेट शिकंजे को तोड़ पाऊंगा? क्या ये सच नहीं के जीवन बीत रहा है और सदियों से ये प्रश्न यूँही दिल्ली और बड़े शहरों में चाय के साथ पढ़े लिखे लोग उठाते रहे हैं और चाय की चुस्की लेते हुए जीवन बिताते रहे हैं? अब कौन भगत सिंह बनना चाहता है? सालाना दो-एक बार फेसबुक पर "वन्देमातरम" लिख देना सड़कों पर धूल फांकने से कहीं बेहतर है। गरीब भी तो अब हमारी ओर नहीं देखते। उनको आदत पड़ गयी कूड़े के ढेरों के बगल में झुग्गी झोपड़ों में रहने की और हम लगे हुए हैं पुराने घरों से निकल कर शहर के बहार बन रहे अपार्टमेंट्स और फ्लैट्स की किश्तें भरने में। समय कभी रुका है भला.. बीत ही जाएगा अपना जीवन भी। और आने वाली पीढ़ियां खुद ही लड़-मर लेंगी इन उदास, नीरस और "आउट ऑफ़ फैसन" सवालों पर।

बहरहाल, बात तो मैं विधाता और दर्शन कि करने की सोच लिए शुरू किया था लेकिन आप ही देखिये कैसे बात कहाँ की कहाँ चली गयी, समय भी ज़ाया हुआ और कुछ निष्कर्ष भी नहीं निकला। निष्कर्ष तो वैसे दर्शन के विषयों में भी कहाँ निकलता है?

-ckh

Comments

pkagrawa said…
Good Written....
Pramil Agrawal

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