कभी गुमसुम, कभी हैराँ, कभी नाशाद कर देंगी
तेरी यादें, मेरे हमदम, मुझे बरबाद कर देंगी
बहुत नाज़ुक ये रिश्ता है सो अब ख़ामोश रहता हूँ
न जाने कौन सी बातें तुझे नाराज़ कर देंगी
कोई शिकवा नहीं दिल को इल्म-ऐ-हकीकत है
कोई दिन और हैं बाकी सांसें आज़ाद कर देंगी
अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धूप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ
यूँही नहीं तुम्हारा नाम… लेते हैं आज भी कुछ है जो ज़िंदगी तमाम मुझको ना दे सकी एक प्यास थी सो रह गई एक ज़ख़्म जो भरा नहीं उम्मीद थी के ...
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