एक टूटी चप्पल पहन कुछ दूर टहलता जाता हूँ
स्वयं को जूते वालों की भीड़ में अकेला पाटा हूँ
सूट-बूट में लिपटे जन को देख- देख घबराता हूँ
फिर कुछ आगे आगे बड़ यमुना तट पर सुस्ताता हूँ
परिस्थितियों से जो करूँ पलायन, मैं कायर कहलाता हूँ
अभाव सामर्थ का सहता आया, साहस का न सह पाता हूँ
विराट रूप ले परुष राम बनू तो, मैं ही राम बनाता हूँ
(पर) नही जोड़ता अब टूटती साँसों को
और न ही चप्पल सिलवाता हूँ
प्रतिदिन उदर आधा भर कर के यमुना तट तक आ जाता हूँ
शिक्षक हूँ मैं है राष्ट्र ये मेरा सोच सोच कुंठित हो जाता हूँ
एक टूटी चप्पल पहन कर कुछ दूर टहलता जाता हूँ .......................
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