कोई इलज़ाम दे रहा था हमें
फिर नया नाम दे रहा था हमें
मांगता था तमाम उल्फत मेरी
और अच्छे दाम दे रहा था हमें
अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धूप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ
यूँही नहीं तुम्हारा नाम… लेते हैं आज भी कुछ है जो ज़िंदगी तमाम मुझको ना दे सकी एक प्यास थी सो रह गई एक ज़ख़्म जो भरा नहीं उम्मीद थी के ...
1 comment:
बहुत सुंदर...........
सशक्त भाव....
अनु
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