आईना तू ही पराया क्यूँ है
दाग चेहरे पे लगाया क्यूँ है
ऐ शमा तूने उजाले तो किये
पर मेरे घर को जलाया क्यूँ है
ऐ खुदा ख़ाक ही हो जाना है
फिर मुझे
तूने बनाया क्यूँ है
अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धूप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ
यूँही नहीं तुम्हारा नाम… लेते हैं आज भी कुछ है जो ज़िंदगी तमाम मुझको ना दे सकी एक प्यास थी सो रह गई एक ज़ख़्म जो भरा नहीं उम्मीद थी के ...
1 comment:
बहुत कुछ है आपके जिम्मे.....इसलिए खुदा ने आपको बनाया है..
:-)
सुन्दर रचना.
अनु
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