Sunday, October 31, 2010

एक ख़त आखिरी

शबनमी लिबाज में जो आगयी शाम फिर
एक नज़्म लिख चले लो आप के नाम फिर

जो हम बार-बार चाँद देखने लगे
तारों के पार संसार देखने लगे
उफ़! कहाँ रह गया करने को कोई काम फिर

सोचते थें लिख चलें रूह की पुकार को
एक ख़त आखिरी खोये हुए प्यार को
क्या पता हो न हो आपसे कभी सलाम फिर

आप तो सो गए चैन से हम मगर
रात जागते रहे और हो गयी सेहर
चर्चे अपने प्यार के शेहेर में हुये आम फिर


दाग न लग सके आपके दामन पे कहीं
लोग आप को न कहदें हाय! बेवफा कहीं
सोच के ले लिए हमने सब इल्जाम फिर

3 comments:

sada said...

सुन्‍दर शब्‍दों के साथ भावमय प्रस्‍तुति ।

संजय भास्कर said...

वाह सर...
वाकई बहुत अच्छा लगा
" एक ख़त आखिरी "
.............अच्छी रचना

POOJA... said...

बहुत प्यारी रचना... बहुत खूब...

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...