Tuesday, October 26, 2010

जीवन का ये आजीवन कारावास


जीवन का ये आजीवन कारावास
कैद में जिसकी हैं अंसंख्य,
स्वछन्द विचरने की अभिलाषा लिए
विवशता में बंधी आत्मायें
किसी विधाता की सोच का परिणाम कैसे हो सकता है भला ?
जंगलों में मार कर-छीन कर
एक दूसरों से जुदा रहने वाले जानवरों में रह कर
जब उसने ये समझा होगा
के जरूरी बहुत है
धर्म में बांधना इन स्वार्थी दरिंदों को
तब कहीं जा कर के उसने ये स्वांग रचा होगा
वेद पुराण गीता कुरान का सृजन कर
मोक्ष का लोभ दिया होगा
और तभी से कैद-कैद सी हो पायी
वर्ना तो वीराने होते
खंजर हर सिरहाने होते
जीवन का ये आजीवन कारावास
कैद में जिसकी मैं हूँ तुम हो
दे रहा है रह रह कर
आज न जाने क्यूँ दर्द बड़ा
क्या क्यूँ कौन ये प्रश्नों से मैं आगे
राहो में अकेला यहाँ
सोच रहा हूँ जन्म निरर्थक ही था शायद
मौत के आगे भी कुछ न होगा

यूँही नहीं तुम्हारा नाम लेते हैं आज भी

 यूँही नहीं तुम्हारा नाम… लेते हैं आज भी  कुछ है जो ज़िंदगी तमाम मुझको ना दे सकी  एक प्यास थी सो रह गई  एक ज़ख़्म जो भरा नहीं  उम्मीद थी के ...