Wednesday, May 2, 2012

हम दुकान सजाते रहे और बाज़ार उठ गया,

हम दुकान सजाते रहे और बाज़ार उठ गया,
कुछ सामान दिखाते रहे और खरीदार उठ गया ;

हाथ पकड़ के हमने उसे बिठाया बार बार,
हाथ झटक के वो मेरा, बार बार उठ गया ;

कोतवालों ने किया घर नीलाम कुछ ऐसे ,
रूठ कर हिस्से से अपने, हकदार उठ गया ;

डूबकर उसकी ग़ज़ल में खोएं इस कदर ,
जागने से पहले ही वो फनकार उठ गया ;

3 comments:

Dev said...

डूबकर उसकी ग़ज़ल में खोएं इस कदर ,
जागने से पहले ही वो फनकार उठ गया ;
बहुत खूब

रविकर फैजाबादी said...

शुक्रवार के मंच पर, लाया प्रस्तुति खींच |
चर्चा करने के लिए, आजा आँखे मीच ||
स्वागत है-

charchamanch.blogspot.com

chakresh singh said...

thank you sir

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...