गंगा में यमुना का मिलना
या कह लो यमुना में गंगा का
गीली रेत पर पड़े कुछ
पदचिन्ह चुप चाप चलतेजा रहे हैं कहीं
या कह लो छोड़ चला कोई इन्हें यहीं
अनुसरण करता मन ही मन इन पदचिन्हों का
जा मिलता हूँ जल में मैं स्वयं ही नंगे पाँव निडर
या कह लो खीचती जाती है मुझे अनवरत धारा अपने साथ उधर
अनिर्वचिनीय भावनाओं का उबार मन में और-
डूब रहा इस धार में मैं उद्भव की आस लिए
या कह लो आ पंहुचा यहाँ आत्मिक प्यास लिए
मानवीय पराभव से दूर मध्य धार में
कदाचित मैं मुखरित हो जाऊं
और अश्रूकड़ बन जल कल कल में खो जाऊं
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