घुंघरू न बांधता
ख़्वाबों के पाँव
में
मैं मर गया
होता इस धूप
छाँव में
बच्चों की टोलियां
लो दौड़ वो
पड़ीं
लॉरी कोई देखो
आई जो गाँव
में
अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धूप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ
यूँही नहीं तुम्हारा नाम… लेते हैं आज भी कुछ है जो ज़िंदगी तमाम मुझको ना दे सकी एक प्यास थी सो रह गई एक ज़ख़्म जो भरा नहीं उम्मीद थी के ...
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