Sunday, March 21, 2010

धर्मं का भी आँगन कितना श्वेत है ?

तेरे मेरे इस देश में
वाराणसी नाम का एक गाँव है
वहां अस्सी घाट पर
एक अलग सा ठहराव है
गंगा का अद्भुत विस्तार उधर
इधर श्रद्धा का अनुपम बहाव है

यहाँ बैठ तू देख मानुज़
एक झलकी अपने ही संसार की
डुबकी लगाता भक्त एक
अंजुली जल से भरी नार की
इस पार बैठ सोच तनिक तू
कहानी क्या है उस पार की

निर्मल जल, मध्य धार लाश तैरती
सामने तेरे भक्त मंत्र बोलता
साथ उसके वो लाश बोलती -
"क्यूँ नहीं तू आँख खोलता
समर्पण तेरा किस अज्ञात में
आखिर कौन तेरे कर्म तोलता ?"

क्षितिज पर टिके उस लाल सूर्या से
अब एय भक्त पूछ जरा तू
साँसों का आखिर तेरी क्या मोल था
है आज जीवित या मरा तू
कहता है तू आस्था है ये तेरी उसमें
मुझको फिर दीखता है इतना क्यूँ डरा तू


दैवीय इस स्थान पर भी
पत्थर जल और बस रेत है
प्रश्नों से दूर भागती भीड़ चीखती
पूछने वाला एक भूत या प्रेत है
मुझपर अधर्म का आरोप सही तू ये बता
धर्मं का भी आँगन कितना श्वेत है ?

No comments:

यूँही नहीं तुम्हारा नाम लेते हैं आज भी

 यूँही नहीं तुम्हारा नाम… लेते हैं आज भी  कुछ है जो ज़िंदगी तमाम मुझको ना दे सकी  एक प्यास थी सो रह गई  एक ज़ख़्म जो भरा नहीं  उम्मीद थी के ...